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BG-9.27

भक्त और भगवान का रिश्ता ऐसा है जैसे की एक हीरे को सोने की अंगूठी में रखा जाए। इसका मतलब भक्त भगवान की शोभा बढ़ाते है, और भगवान भक्तो की शोभा को बढ़ाते है।  जैसे कृष्णा और उनके भक्त।  भगवन राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान और अन्य भक्तो के साथ बहुत सुन्दर लगते है।  श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्त इसका दूसरा दृष्टिकोण क्या है? हमें भगवान को भगवान को हमेशा दूसरे भक्तो के सान्निध्य में देखना चाहिए।  इसका मतलब ये है, की अगर हम भगवान से प्रेम करते है, तो हमें भक्त से भी प्रेम करना चाहिये।  केवल भगवान से सम्बन्ध रखने का प्रयास करना बुद्धिमानी नहीं है। ये प्रयास हमारी भक्ति को अपूर्ण कर देगा। लेकिन अगर हमने भगवान और उनके भक्तो को एक दूसरे के सान्निध्य में आनंद से देखा, उसका सौंदर्य देखा, तो हमारा जीवन परिपूर्ण हो जायेगा।  भक्त को दुसरे भक्तो को भगवान के साथ सम्बन्ध में देखना चाहिये।  जो मेरे साथ भक्ति में जुड़ जाता है, मैं उसमे हूँ, और वो मुझमे है।  भगवान हमें बता रहे है, की हमें किसी का द्वेष नहीं करना चाहिये। और विशेष करके भक्तो से कभी द्वेष नहीं करना चाहिये। इस...