- भक्त और भगवान का रिश्ता ऐसा है जैसे की एक हीरे को सोने की अंगूठी में रखा जाए। इसका मतलब भक्त भगवान की शोभा बढ़ाते है, और भगवान भक्तो की शोभा को बढ़ाते है।
- जैसे कृष्णा और उनके भक्त।
- भगवन राम सीता, लक्ष्मण, हनुमान और अन्य भक्तो के साथ बहुत सुन्दर लगते है।
- श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके भक्त
- इसका दूसरा दृष्टिकोण क्या है?
- हमें भगवान को भगवान को हमेशा दूसरे भक्तो के सान्निध्य में देखना चाहिए।
- इसका मतलब ये है, की अगर हम भगवान से प्रेम करते है, तो हमें भक्त से भी प्रेम करना चाहिये।
- केवल भगवान से सम्बन्ध रखने का प्रयास करना बुद्धिमानी नहीं है। ये प्रयास हमारी भक्ति को अपूर्ण कर देगा। लेकिन अगर हमने भगवान और उनके भक्तो को एक दूसरे के सान्निध्य में आनंद से देखा, उसका सौंदर्य देखा, तो हमारा जीवन परिपूर्ण हो जायेगा।
- भक्त को दुसरे भक्तो को भगवान के साथ सम्बन्ध में देखना चाहिये।
- जो मेरे साथ भक्ति में जुड़ जाता है, मैं उसमे हूँ, और वो मुझमे है।
- भगवान हमें बता रहे है, की हमें किसी का द्वेष नहीं करना चाहिये। और विशेष करके भक्तो से कभी द्वेष नहीं करना चाहिये। इससे हमारी गति क्या होगी, भगवान हमें अपने पास नहीं रखेंगे, क्योंकि जो भगवान के साथ है, उनके साथ आपका प्रेम नहीं है।
- भगवान जैसे भक्तो को देखते है, हमें भी वैसे ही भक्तो को देखना चाहिये।
क्योंकि हमारा ह्रदय अनेक जन्मो से भौतिक बंधनो से जकड़ा है, वो इतनी आसानी से बाहर नहीं आने वाला। इसलिए अगर कोई दूसरा भक्त विशेष प्रगति करता है, दूसरा भक्त तेजी से भगवान की भक्ति में आगे बढ़ रहा है, तो स्वाभाविक ऐसे लगता है, की वो क्यों मैं क्यों नही। लेकिन ये भावना भगवान को मंजूर नहीं। भगवान कहते है, की मेरा भक्त मुझमे है, और मैं उसमे हूँ। इसलिए जब मैं भक्त के प्रति मात्सर्य (ईर्ष्या) रखता हूँ। प्रतिस्पर्धा का भाव रखता हूँ। द्वेष का भाव रखता हूँ। भले ही सीधे सीधे द्वेष नहीं है, लेकिन भीतर से कही न कही असूया है। तो हमें समझ लेना चाहिए की हमें सीधा भगवान से ही ईर्ष्या हो गयी है, मैं भगवान से ही द्वेष कर रहा हूँ।
- भगवान् ने हमें बताया की कैसे हम भक्ति कर सकते है, आप सब कुछ मेरे लिए करो, ऐसे करने से आप सन्यास योग में रहोग। भले ही आप गृहस्थ हो, लेकिन सन्यास योग में रहोगे। भगवान बताते है, की अगर हम ऐसे करेंगे को जो सर्वोच्च स्थान है, मेरे साथ रहने का, वो मैं आपको प्रदान करूंगा।
- केवल सरल ह्रदय से की हुई भक्ति से, जिसमे द्वेष को कोई स्थान नहीं है।
- बस हम लोग साथ में हरी नाम करते है, उसी में मुझे आनंद आता है।
- बोधयन्ति परस्परं
- कभी कभी हमें लग सकता है, की आज चर्चा में बहुत आनंद आया, कभी कभी हमें लग सकता है, की बहुत साधरण था, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
- कृष्णा क्या देखते है, की ये भक्त साथ में आ रहे है, और ख़ुशी से उनके बारे में चर्चा कर रहे है। इसमें उन्हें बहुत आनंद आता है।
- श्री जानकी माताजी का प्रश्न
- हम भगवान के भक्त बने या उनके भको के भक्त बने।
- भगवान जब श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में आते है, तो वो हमें बता रहे है, की कैसे भक्त का भक्त बनाना है। तो हमारे ये ही कार्य है, की कैसे हम भक्त के भक्त बने। क्योंकि हमारी कृष्ण को समझने की या उनकी सेवा करने की कोई योग्यता तो है नहीं, हमारा एक ही माध्यम है, भक्तो की हृदयपूर्वक एकदम स्वच्छ ह्रदय से सेवा करना, हमें ऐसे जीना चाहिए।
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