Bhagvad Gita 4.01 Disucssions - 12 July 2020
- जो लोग हमारे ऊपर निर्भर है, उनके प्रति हमारी क्या ज़िम्मेदारी है।
- लीडर का काम है। कि वो अपने dependents को भगवद गीता का ज्ञान परम्परा के अनुसार प्रदान करे।और मनुष्य जीवन का लक्ष्य, जो भगवान को फिर से प्राप्त करना है।इस लक्ष्य को प्राप्त करे, या प्राप्त करने के मार्ग पर क्रमण करे।
- कोई भी लीडर स्वतंत्र नहीं है। यहाँ तक की सूर्य और चंद्र भी। उनकी भी ज़िम्मेदारी होती है। leadership मतलब ज़िम्मेदारी।
- उन्हें कैसे सिखाना है।
- शिक्षा (Education)
- संस्कृति (Culture)
- और भक्ति (Devotion) के द्वारा
- भगवान इस ज्ञान को किसको दे रहे है।
- विवशवान को इसलिए दिया, क्योंकि वे क्षत्रिय है। भगवान ज़्यादा करके क्षत्रिय कुल में आते है। या क्षत्रियो को ये ज्ञान देते है।
- राम, कृष्ण
- यमराज, भीष्म, प्रह्लाद, ध्रुव, युधिष्ठिर
- प्रतापरुद्र महाराज
- वर्णाश्रम धर्म
- सत्य यूग में हंस class ही रहता था।
- त्रेता यूग में वर्णाश्रम धर्म भगवान देते है।
- ब्राह्मण की आवश्यकता
- वो धर्म को पढ़ते और समझते है, और बताते है की धर्म क्या है।
- क्षत्रिय की आवश्यकता
- धर्म की रक्षा करने के लिए।
- धर्म के आधार पर जो नहीं चलता, उसको दंड देने का काम क्षत्रियों का होता है।
- हर क्षत्रिय राजर्षि होना चाहिए। उसको राजा के साथ साथ ऋषि भी होना चाहिए, उसके पास ऋषि के सारे गुण होने चाहिए। एक महान ब्राह्मण के गुण भी उसमें होने ही चाहिए।
- वैश्यों का काम
- अर्थोपार्जन करना।
- शूद्र का काम
- बाक़ी लोगों को मदद करना।
- क्षत्रिय के धर्म
- सभी को सीमा बढ़ाने को कहा गया।
- हम ऐसा कभी नहीं कर सकते की समाज में युद्ध ना हो।
- समाज में जो असंतुलन होता है अधर्म के कारण, उसको ठीक करना ही पड़ता है।
- लेकिन वो युद्ध धर्म की रक्षा करने के लिए करना चाहिए।
- वर्णाश्रम के स्तर
- आदिवासी में भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्या, शूद्र होते है।
- अमेरिका में भी
- चंद्रमा में भी
- मंदिर में bramhachari में भी
- परिवार में भी। (२५:००)
- शरीर में
- सिर ब्राह्मण
- भुजा क्षत्रिय
- पेट वैश्य
- पैर शूद्र
- सूक्ष्म शरीर में भी
- सूक्ष्म शरीर में वर्णाश्रम
- intelligence । ब्राह्मण
- Determination । क्षत्रिय
- मैं कैसे भी करके बुद्धि के बताए हुए मार्ग पर चला जाऊँगा।
- हम सबके अंदर क्षात्र प्रव्रत्ति रहती है।
- हमेशा क्षात्र प्रव्रत्ति को जाग्रत रखना है।
- क्योंकि माया हमें हमेशा हराने का प्रयास रहती है।
- लेकिन क्षत्रिय को हराया भी तो भी वो फिर से खड़ा होता है।
- क्षत्रिय कभी हार नहीं मानता। वो मार भी जाएगा लेकिन हार नहीं मानेगा। फिर से खड़ा होता है।
- हमारे अंदर भी वो क्षात्र प्रव्रत्ति होनी चाहिए।
- क्षात्र प्रव्रत्ति का काम क्या है। गुरु, साधु, शास्त्र और परमात्मा के द्वारा दी गयी बुद्धि को शरीर, मन और इंद्रियो पर शाशन कराना ।
- और दूसरी बुद्धि, जो माया द्वारा नियंत्रित मन के प्रभाव से दुर्बुद्धि बन गयी है, उस बुद्धि को दंड देना चाहिए।
- ये हमारे अंदर की क्षात्र प्रव्रत्ति का काम है।
- गीता किसको बतानी है
- हमारे अंदर के क्षत्रिय को। हमारी क्षात्र प्रव्रत्ति को।
- कि हम इस रास्ते को छोड़ेंगे नहीं। चाहे कुछ भी हो।
- कितना भी मारो पीटो हमको। माया कितने भी चाँटे क्यों ना मारे। कितनी भी लात क्यों ना मारे। फिर भी हम उठेंगे। मेरे पास ताक़त है। मैं छोड़ूँगा नहीं। मेरा पास गुरु का आधार है। मेरे पास भगवान का आधार है।
- क्षत्रियों का काम ही है। की भगवान की जो वाणी है। उसको ही आगे बढ़ाना।
- उसी को संरक्षण देना।
- कभी कभी हमारे मन में ऐसा आता है। की अगर भगवान की इच्छा है, तो सब होते रहेगा।
- लेकिन प्रभुपाद में वो क्षात्र प्रव्रत्ति थी। की नहीं, मेरे गुरु का आदेश है।
- ७० साल की उम्र में भी छोड़ा नहीं उन्होंने। हार्ट अटैक आने पर भी नहीं छोड़ा। क्षात्र प्रव्रत्ति को ही भगवान इस ज्ञान की सुरक्षा का दायित्व देते है।
- तो भगवान ने हमारी क्षात्र प्रव्रत्ति को ये दायित्व दिया है।
- हमें क्षत्रियों को धर्म सिखाना है।
- क्योंकि शिक्षा और संस्कृति में परिवर्तन में उनका बहुत बड़ा योगदान होगा।
- हमारे समय पे राम और कृष्ण स्कूल की किताबों में थे। अभी तो शिवाजी भी नहीं ढूँढ सकते किताबों में।
- हमारे अंदर के क्षत्रिय को जागरूक रखना है और समाज के क्षत्रिय तक ये बात पहुँचानी है।
- हम अपने अंदर के युद्ध में कैसे जीते। और युद्ध में बार कैसे टिके रहे।
- अभ्यास
- हमारी क्षात्र प्रव्रत्ति हमारी दृढ़ता को सम्हाले रखना है।
- दृढ़ता अभ्यास से ही आती है।
- जैसे कोई व्यक्ति बार बार ये पूछे कि muscles कैसे बनाऊँ।
- muscles बनाने के लिए आपको व्यायाम करना ही पड़ेगा। वजन बढ़ाना ही पड़ेगा।
- लेकिन अगर हम पूछे, कि नहीं कोई ऐसा तरीक़ा बताओ की अपने आप ही मेरे muscles बड़े दिखे। वो तो होने वाला नहीं है। हमें अभ्यास करना ही पड़ेगा।
- दृढ़ता का अभ्यास होना चाहिए।
- सतसंग व्यायाम के जैसा है।
- जैसे जिम को कोई व्यक्ति जाता है। वो दूसरे लोगों के बड़े बड़े muscles देखता है। तो वो कहता है की मेरे भी बड़े muscles हो जाएँगे। उसको विश्वास होता है।
- भक्तों का संग हमारे spiritual muscles को बढ़ाने के लिए हमारी spritual gym है।
- टानिक/खाना
- भगवान का नाम सबसे बड़ा spritiual टानिक है।
- ये टानिक लेते रहने के लिए हमें spiritual gym में जाते रहना पड़ेगा।
- कई बार हम philosophy पर बहुत ज़ोर देते है। लेकिन हरिनाम को भूल जाते है।
- जैसे कई बार हम जय राधा माधव अटेंड नहीं करते, सीधा लेक्चर में जाकर बैठते है। लेकिन शुरू का जय राधा माधव और आरती भी महत्वपूर्ण है।
- प्रभुपाद ने हरिनाम को बहुत महत्व दिया।
- हमारी 99 प्रतिशत उन्नति केवल हरिनाम से आने वाली है। जपा और कीर्तन से।
- श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन को जप से भी ज़्यादा महत्व दिया है। लेकिन जप भी करना ज़रूरी है।
- संग में आकर कीर्तन करना।
- ख़ाली Diety worship करना और भक्तों के संग में ना आना। इसको भागवतम कनिष्ठ भक्त मानती है।
- हम भक्तों के आश्रय के बिना ना तो हरिनाम कर सकते है। ना तत्त्व ज्ञान समझ सकते है। ना आगे बढ़ सकते है।
हम लोग मीटिंग में इम्प्रूव कैसे करे।
ReplyDeleteजिस website से हम लोग गीता पढ़ते है। वहाँ गीता की हिंदी में बहुत ग़लतियाँ है। हम लोग कल से यहाँ से पढ़ेंगे।
https://krishna-shiksha.blogspot.com/2020/07/bhajan-sandhya-links.html
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सभी को सीमा बढ़ाने को कहा गया। why ?
ReplyDeleteइससे अनावश्यक युद्ध हो सकता है ?
How to punish durbuddhi in us?
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