Bhagvad Gita - 5.18 Discussion - 21 July 2020


Bg. 5.18

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
श‍ुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ॥ १८ ॥
vidyā-vinaya-sampanne
brāhmaṇe gavi hastini
śuni caiva śva-pāke ca
paṇḍitāḥ sama-darśinaḥ

  • जब तक हम विनम्र नहीं होते, हम सबको एक समान नहीं देख सकते।
  • हर शरीर में आत्मा और परमात्मा दोनो स्थित है। हर शरीर परमात्मा का एक मंदिर है।
    • इसका मतलब ये नहीं है की हम शेर को जाकर गले लगाएँगे।
  • We should not judge people, but we should discriminate.
    • कृपा 
      • उनके प्रति करनी चाहिए, जो ज्ञान को ढूँढ रहे है. हर व्यक्ति को कृपा देनी। भगवान की कृपा को transfer करना।
    • मैत्री 
      • भक्तो से करनी चाहिए। विशेषकर उन भक्तो से जो किसी की निंदा नहीं करते। ऐसे संग से ही हमारा उद्धार होगा।
    • उपेक्षा 
      • जो भगवान और भक्तो के प्रति द्वेष रखते है, उनकी उपेक्षा करनी चाहिए।
      • असत्संग त्याग ऐ वैष्णव आचार।
      • जो असत लोग है, हमें भगवान के सम्बंध में कोई रुचि नहीं है, उनका संग त्याग देना चाहिए। 
      • अगर social purpose से हमको लगता हो, की हमको इनकी बहुत ज़रूरत है, तो जितना ज़रूरत है, उतना काम करके बाहर निकल जाना चाहिए।
  • अनजाने में किया पाप vs ईर्ष्या/द्वेष में किया गया पाप 
    • अनजाने में पाप तो सबसे होता है। 
      • जैसे घड़ा रखने पर बहुत सारे जीवाणु (Bacteria) मार जाते है।
      • चलते हुए चींटी मर जाती है।
      • ये अनजाने में किए गए पाप है।
    • लेकिन ईर्ष्यालु व्यक्ति जान बूझ कर पाप करते है।
      • जो भगवान से या भक्तो से ईर्ष्या करते है, वो पापी है, क्योंकि वे उनको नुक़सान पहुँचना चाहते है।
  • एक व्यक्ति दूसरों से ईर्ष्या क्यों करता है।
    • ईर्ष्या इसलिए होती है, क्योंकि उनके पास हमसे अच्छा होता है।
  • प्रश्न: कोई भगवान से ईर्ष्या कैसे कर सकता है?
    • क्योंकि भगवान परम नियंता और भोक्ता है। और हम भी हर समय नियंता (controller) और भोक्ता (enjoyer) बनना चाहते है।
    • हम लोग कंट्रोल करना चाहते है, 
      • अपने आस पास के सभी लोगों को
      • अपने जीवन को 
      • दूसरों के जीवन को 
    • हम भोग करना चाहते है। और भोग के केंद्र (center of enjoyment) बनना चाहते है। लेकिन कृष्ण कहते है..
      • भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
      • सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥ २९ ॥
    • कि सारे कार्यों के भोक्ता वही है।
  • गुरु और साधु किन पर ज़्यादा ध्यान देते है।
    • जो निष्ठा से उनके पास सुनने आते है। वो उनको ज्ञान देते है। ये यथा मम प्रपद्यंते..
    • या कोई व्यक्ति बहुत कष्ट/ज़रूरत में है, तो वो kindness के कारण उनको ज़्यादा समय दे सकते है।
  • ज्ञान की प्राप्ति के लिए नम्रता आवश्यक है।
  • Being non judgemental is very very important quality of a devotee.
    • हमको कभी भी दूसरों के ऊपर Judgemental नहीं होना चाहिए 
    • Judge करने का अधिकार किसको है?
      • Superior authority 
      • गुरु 
      • माता पिता 
      • भगवान 
    • Authority has duty to sometimes judge people who are dependent on them.
    • इन सब लोगों के अलावा और किसी को कभी judge नहीं करना चाहिए, क्योंकि उससे बहुत बड़ी गलती हो सकती है।
    • प्रचार के समय बहुत सरल और limited potential दिखने वाले व्यक्ति भी बहुत अच्छे भक्त बनते है।
    • इसलिए कभी भी किसी को judge नहीं करना चाहिए, discriminate कर सकते है।
    • क्यों discriminate करना? ये समझने के लिए, की किससे कृपा, मैत्री, उपेक्षा करनी है।
  • जो लोग भक्ति करने का प्रयास कर रहे है, उन्हें अपने आप से किसी भी व्यक्ति या जीव को बिना वजह तकलीफ़ नहीं देनी चाहिए।
  • How do we come to level of this shloka (BG 5.18)
    • BG 5.17
    • हमको चार चीजें भगवान के चरणो में डालनी है।
      • बुद्धि 
      • मन 
      • विश्वास (श्रद्धा)
      • हमारी आश्रय लेने की प्रव्रत्ति (surrender or shelter)
    • ये हमको प्रतिदिन करना है।
    • That is the method by which we will become that expected Krishna conscious perosn who does not have any distinction among caste and species.
  • This is the most important shloka for a preacher.
    • Unless a preacher does not have realization or at least intellectual acceptance of this shloka, they cannot preach.
    • Prabhupad gave the reference of this shloka when south Indian brahmans questioned him regarding giving brahman Diksha to Europian and American devotees.
    • प्रभुपाद ने उस समय बताया, की हर जीव का एक Potential है, जो की ऊपर आ सकता है। इसलिए इसी श्लोक के आधार पर मैंने पूरे विश्व भर में प्रचार किया है।
  • Lord Chaitanya was living this Shloka all the time. He made all the forest animals like lion, deer, elephant chant and dance.
  • Srila Prabhupad also exemplified this shloka by preaching to the mlecchas. Srila Prabhupad called all the druggists and feed them Krsna Prasadam and made them Krsna Conscious.



Comments

Popular posts from this blog

BG selected verses from Shloka Ratnavali Book

Bhagvad Gita 4.01 Disucssions - 12 July 2020