Bhagvad Gita 3.37 discussion
श्री भगवानुवाच
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥ ३७ ॥
The Supreme Personality of Godhead said: It is lust only, Arjuna, which is born of contact with the material mode of passion and later transformed into wrath, and which is the all-devouring sinful enemy of this world.
Madhavanand pr:
पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा की बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा भक्ति मार्ग पर। इच्छा है हमारी भगवान के पास जाने की लेकिन फिर भी हैम क्यों नही जा पाते। दूसरी तरफ लोग खींच जाते हैं उसका कारण क्या है।
3.36
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः ।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः
Arjuna said: O descendant of Vṛṣṇi, by what is one impelled to sinful acts, even unwillingly, as if engaged by force?
उसका उत्तर भगवान हमको 3.37 में भगवान श्री कृष्णा अर्जुन को दे रहे हैं
Amit Prabhu:
हमारे पास आंशिक स्वतंत्रता होती है। जब हमारे पास मुक्त समय होता है उदाहरण जॉब पूर्ण होगया उसके बाद जो समय हमको मिलता है उसमें मै सेवा कर सकता हु या खाली बैठ सकता हु। तो इस स्वतंत्रता का जब हम सही उपयोग करेंगे तो हम इसकी चपेट में नही आएंगे
Madhavanand pr:
Yes how to use independence
आराम करना है या वापस सेवा में लगना है
Amit pr
अगर हमारे मुक्त समय में हम सेवा में संलग्न नही रहे तो कुछ काम में हम लोग गिर सकते हैं
Madhavanand pr:
The empty time between two services is extremely dangerous time.
भक्त का एक गुण बताया गया है "अव्यर्थ कालम" कोई भी समय को वो व्यर्थ खत्म नही करता। वह हमेशा सोचता है इस परिस्थिति में क्या कर सकता हु भगवान के लिए। और अगर कुछ नही दिख रहा है करने जैसा तो वह भगवान का नाम ले लेता है। भगवान का नाम लेने के लिए आपको किसी साधन की आवश्यकता नही है।
Empty mind is devil's workshop
जब हमारे पास समय आता है और कुछ करने जैसा नही है , then devil of maya takes over. Devotee is trying to engage himself 24 hours a day.
Nitesh pr:
श्री कृष्णा ने भौतिक जगत की रचना इस प्रकार की है की काम और क्रोध हमेशा रहेगा और वह जाएगा भी नही। काम और क्रोध को आध्यात्मिक रूप में उपयोग कर सकते हैं कृष्ण की सेवा के लिए।उदाहरण हनुमानजी
Madhavanand pr:
काम और क्रोध निकलने वाला नही है। हम उसको कैसे उपयोग में लाते है। जैसे हनुमानजी ने क्रोध को भगवान की सेवा में लगाया उसी प्रकार गोपियों ने काम को भगवान की सेवा में लगाया। काम और क्रोध बुरे नही हैं और हमें देखना चाहिए कैसे हम उनको उपयोग में ला सकते हैं।
Amit pr:
हम क्रोध को दिशा कैसे दे सकते है। it s an overpowering force.
Madhavanand pr:
Practice अभ्यास करना पड़ता है। क्योंकि यह एक वेग में से हैं
वाचो वेगम
मनसः वेगम
क्रोध वेगम
जिव्हा वेगम
उदार उपस्थ वेगम
इनको जो वश में कर सकता है उसीको हम गोस्वामी कहते हैं
क्रोध भक्त द्वेषी जने -- नरोत्तम दास ठाकुर
जो भक्तों, भगवान का द्वेष करता है उसके प्रति क्रोध करो
काम कृष्णार्पणे
काम the pinnacle of desire in the material world is sex desire.
काम मतलब सब लोग समझते हैं sex पर ऐसा नही हैं। काम याने इच्छा इच्छाओं में से सबसे बलशाली इच्छा है sex desire .
क्यों ऐसा है ?
प्रभुपाद कहीं और लिखते हैं
Sex is a very predominant kind of force in the material world.
लेकिन ये इसलिए है क्योंकि आध्यात्मिक जगत में भी sex है।
In spiritual world what is love in the material world it is transformed into lust.
भगवान के प्रति जो शाश्वत प्रेम है उसी का रूपांतर / प्रतिबिम्ब है वही काम है।
That is why it is so powerful.
Dongre pr:
हमारी इच्छाएं ही क्रोध का कारण होती हैं। इच्छाये निरंतर होती रहती हैं लेकिन क्रोध कभी कभी रहता है। हमारे मन हम याद कर सकते कब हमें क्रोध आया। क्रोध आने से तमोगुण का प्राकट्य होता है। इच्छाये तो हैं लेकिन क्रोध हमको निरंतर नही दिखता तो हमें ऐसा लगता है की हम अच्छे ही है सब अच्छा चल रहा है। यह भ्रम से निकलने के लिए क्या करना चाहिए।
Madhavanand pr:
Predominantly we are in Rajo Gun.
जो शुद्ध सत्व जिसको हम भगवत प्रेम कहेंगे वही जो नीचे आके पतित होता है उसको हम काम कहेंगे। वही जो और नीचे आएगा उसको क्रोध कहा जाएगा। वह उसी के रूपांतर हैं। रजो गन में ज्यादातर रहने से निरंतर हमारी कामनाएं होती रहती है और उनकी पूर्ति नही हुई तो हम क्रोध की तरफ जाते हैं। जो तमोगुणी व्यक्ति निरंतर क्रोध में रहता है। उसको कभी कभी दूसरी इच्छा होती है। इच्छा करना और उसके प्रति क्रोध करना वह दो ही चीजें जानता है।
We need to elevate our consciousness from Rajo Gun to Sattva Gun that is what Prabhupad is telling us here.
उसी की प्रक्रिया हमने 3.30 में पढ़ा
Somehow we have to keep a discipline
साधना भक्ति में हमारी इच्छा हो या न हो उसे हम करते हैं।
इस प्रकार मन को आदत हो जाती है किस प्रकार से चलना है।
हमारे बुद्धि को आदत हो जाती है के मन को कैसे चलाना है।
इसी का नाम है भक्ति
Apurva pr:
ये श्लोक में श्रुष्टि की रचना क्यों की है उसका एक कारण बताया गया है। जो रजस तामस गुण में रहते हैं उनको सिख देने के लिए भगवान ऐसी स्थिति में डालते हैं की अंत में वह ऊब जाता है उस स्थिति से।
उसको जिज्ञासा होने लगती है की मैं क्या हु
Madhavanand pr:
It is a reforming centre. हमको सुधारने के लिए बनाया गया है। यहां भी शुद्ध सत्त्व में रहो और इच्छा भी करो भगवान को प्रेम भी करो और बीच में कुछ नाटक कर लो। उसकी इच्छा के अनुसार और कितना नीचे जाना चाहता है चले जाने दो।
इस प्रकार से जब वह बहुत पीड़ित होने के बाद ऐसे प्रश्न पूछता है की भाई में पीड़ित क्यों हु इसलिए प्रभुपाद कहते हैं यहां पर this enquiry is the beginning of the vedanta sutra.
परमपूज्य राधानाथ महाराज बहुत सुंदर कहते है एक लेक्चर में
Miseries, unhappiness of this material world is Krishnaprem in a seed form.
भगवान या भक्त से जीव पूछता है की मुझे यह पीड़ा क्यों हो रही है।
यही अथातो ब्रह्म जिज्ञासा है। जब पीड़ा क्यों हुई यह प्रश्न आया तो समझने का उसका मार्गक्रमण शुरू हो गया और अगर उसने सही व्यक्ति से पूछा तो सही मार्ग पर जाएगा।
So it is a seed form of Krishna prem.
पीड़ा क्यों हो रही है, काम क्रोध कृष्णा प्रेम फिर उसके लिए कार्य करो भक्ति के मार्ग में जुड़ जाओ और प्रकार से भक्ति लाता का बीज सम्पन्न करो। उसको सिंचन करो खाद डालो कृष्णा कथा का और आगे फिरसे अपने स्वरूप को प्राप्त करो।
यह सब सारांश में पूरा तत्वज्ञान है।
Iyer Mataji:
We can over come the Rajo gun by 4 principles like chanting etc. Chanting hearing etc our consciousness should change.
Madhavanand pr:
नावविधा भक्ति
तीनो गुण हमें कठपुतली के तरह नाचते हैं। हम तीन गुणों के प्रभाव में ही रहते है हमें अपना कुछ स्वतंत्र है ही नही।
पहले हमने श्लोक पढा
प्रकृते क्रियमाणानि .......
करता तो यह तीन गुण है। प्रकुति तीन गुणों के अनुसार नाचा रही है। हम सोच रहे हैं की हम कुछ हैं । अगर तीन ही हम पर नियत्रण कर रहे हैं तो हमें लगेगा की अगर भक्ति मुझसे होनी है तो होगी। अगर नही हुई तो मेरा क्या उसमें दोष है।
तीन गुण आपस में भी प्रतियोगिता करते हैं
सुबह ब्रह्ममुगुरथ में सत्व, दिन राजस, रात में तमो गुण प्रभावी रहता है।
तो इच्छा का बहुत महत्व है । अगर हम इच्छा करें की सुबह उठके
Today I will be very enthusiastic to serve Krishna. Your desire decides which guna will be prominent.
अपनी इच्छा से गुणों के प्रभाव को बदल सकते है पर एक बार वह उस रास्ते चला गया तो फिर वह चला जाता है। किसी भी समय आपको तमो गुण का प्रभाव जान पड़ता है पर अगर आपने सोच लिया दृढ़ इच्छा बना लिया की नही मुझे इससे बाहर आना है, इसे हम संकल्प बोलते है। Krishna will help us. पर वह इच्छा कितनी बलवान है यह हमें पता चलेगा अपने संग से । हमारा संग कितना मजबूत है Krishnas articles, devotees, literature then automatically our desires will remain in Krishnas circle.
Apurva pr:
अपने नित्य वर्धमान चिदानंद के लिए भगवान ने अपने आपको अनेक रूपों में विस्तारित कर लिया और जीवात्मायें उनके इस चिदानंद के ही अंश है। इसका मतलब क्या हुआ
Madhavanand pr:
वेदों में एक श्लोक है एको हम बहुशा
जो एक भगवान है जो आनंद को बढ़ाना चाहते है । आत्माराम हैं पर आनंद बढ़ाना चाहते है। तो अगर खूद का आनंद है अगर आप उसे बढ़ाना चाहते हैं तो आप लोगों के साथ ही बढा सकते है। अगर आपके पास एक सुवर्ण ग्रह है पर कोई कहनेवाला नही है की देखो अपूर्व प्रभु के पास कितना अच्छा सुवर्ण ग्रह है तो क्या आपको मजा आएगा?Everything is perfect. Will you be happy ? Happiness increases when it is in the company of people. Krishna expands himself into innumerable living entities. अब ये कब करते है कैसे करते हैं यह सब अचिन्त्य है। कब शुरू हुआ, पहले जब अकेले थे तो कैसे दिखते हैं ? समझो आपने खिलौना बनाया क्योंकि आपको कुछ आनंद लेना था। खिलौना आपको आक्रमण करता है आप क्या करोगे ?। खिलोने का उद्देश्य है आपको आनंद देना । वह नही कर पा रहे है। फिर आपको खिलोने को तोड़ मोड़ के फिर से सीधा करना है।
that is what is the material world. It is a reforming house. जीवात्मा का स्वभाव है कृष्णा को आनंद देना, सेवा करना और उसी आनंद में अपना आनंद स्वीकार करना है। अपने आप होता है वो। जितना भक्त भगवान को आनंद देता है उससे कहीं ज्यादा आनंद भक्त को होता है। भगवान उसी प्रकार से उसका आदान प्रदान करता है। यही भक्ति का अंग है। जब तक हम आदान प्रदान नही करते तब तक हम पीड़ित रहेंगे और प्रश्न पूछते रहेंगे ऐसे क्यों हो रहा है, वैसा क्यों हो रहा है।
Apurva pr:
Satvik, rajasik tamasic भोजन रहता है, प्रकृति के तीन गुण है, तो हम विषय के संपर्क में आते है वैसे ही गुण बदल जाते है।
दिन में जो गुणों का बदलाव होता है उसका प्रभाव हमपर कैसे होता है ? भगवान के संपर्क में नही है तो हम तीन गुणों से नियंत्रित हो जाते हैं ?
Madhavand pr:
Three gunas are personalities and are competing with each other who will control this person. उनके सामने एक खिलौना है सत्व गुण बोलता है में करूँगा, तमोगुण बोलता है में करूँगा। लेकिन अगर हमने चुना की मुझे सत्व गुण में ही रहना अच्छा लगता है तो अपने सत्वगुण के अनुसार दिनचर्या बनाई, विचार किये, संग रखा, तो हमारे ऊपर सत्व गुण ज्यादा प्रभाव डालेगा। लेकिन फिर रजो गुण का प्रभाव आएगा क्यों की वह रजो गुण का समय है। रात के तमो गुण में भी शुद्ध भक्त है वह सत्व गुण में ही रहता है। हमारे इच्छा से ही गुण आच्छादित करते है।
We need to practice. Slowly we have to come to satvagun and then come to vishudha Satva gun.
जिसको हम लोग वासुदेव प्लेटफार्म कहते है जिसमे भगवान का साक्षात्कार होगा।
That is very easily achieved by the mercy of the spiritual master. गुरु की ताकत से आपको बाहर आना है।
Apurva pr:
3.30
And when one acts in such Kṛṣṇa consciousness, certainly he does not claim proprietorship over anything. This consciousness is called nirmama, or “nothing is mine.” And if there is any reluctance to execute such a stern order, which is without consideration of so-called kinsmen in the bodily relationship, that reluctance should be thrown off; in this way one may become vigata-jvara, or without feverish mentality or lethargy. Kinsmen is said in which context ?
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