Bhagvad Gita 3.13

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥ १३ ॥

इन्द्रिय तृप्ति के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को चोर और पापी क्यों कहा गया है?
अगर हम हमारे लिए जो भगवान ने दिया है, उसको हम अपना भी कहे. तो भी इन्द्रिया कभी संतुष्ट नहीं होती.  और हमें और ज्यादा इन्द्रिय तृप्ति के लिए औरो की संपत्ति चुराने की इच्छा हो जाती है. और हम इन्द्रिय तृप्ति की इच्छा के कारन चोरी और पाप के लिए उद्यत हो जाते है. 
जब जीवन का उद्देश्य भोग करना होता है. तो हम औरो का शोषण करेंगे. 
और जब जीवन का उद्देश्य सेवा करना  होगा, तो हम त्याग करेंगे. 

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