Bhagvad Gita - 4.03 Discussion - 15 July 2020

  • अगर हमें गीता का ज्ञान भकों की परम्परा से, भक्तों के वाणी से, भक्ति की टीका से मिलेगा। तो ही हम इस ज्ञान को सही रूप में समझ पाएँगे।
  • गुरु और शिष्य दोनो को authentic होना चाहिए। तभी Full power transfer होगा।
  • भागवत गीता के सही Recipiet कैसे बने।
    • हममे भगवान के प्रति मैत्री की भावना होनी चाहिए 
    • हमें भगवान की भक्ति करने का प्रयास करना चाहिए।
    • अगर ये दोनो चीजें नहीं है। तो हमारा Recieving capacity limit हो जाता है।
    • अगर ये दोनो चीजें है। तो full power transfer होता है।
    • जैसे, परीक्षित महाराज का 7 दिन भागवत कथा सुनकर  जीवन परिपूर्ण हो गया। लेकिन वहाँ पर सभी उपस्थित लोगों का जीवन परिपूर्ण हो गया, ऐसा वर्णन नहीं है।
    • प्रभुपाद के कुछ शिष्यों का जीवन परिपूर्ण हो गया, लेकिन कुछ लोग छोड़ कर भी चले गए।
    • अभी की आचार्यों के शिष्यों में भी।
    • अगर आपको भक्त बनना है, तो आप भगवान से पूछो की कैसे बनना है। और भगवान क्या बता रहे है। 
      • आप भक्त होने चाहिए।
      • और उनके प्रति मैत्री का भाव होना चाहिए।
    • ये दोनो गुण हमारे जीवन में नितांत आवश्यक है।
  • भगवान  के लिए सारे जीवों के प्रति मैत्री होना स्वाभाविक है। ये उनका स्वभाव है।
    • सूहृदम सर्व भूतानम 
    • और भगवान ऐसे मित्र है, जो हमें किसी भी परिस्तिथि में छोड़ते नहीं है। हमने उनको छोड़ दिया, दूसरा रास्ता ले लिया, फिर भी हमको छोड़ते नहीं है।
    • हम कोई भी योनि में जाएँगे, सूवर की योनि में जाएँगे, worm in stool की योनि में जाएँगे, अमीबा की योनि में जाएँगे,  शेर की योनि में जाएँगे। गंदी गंदी जगहों में भी वो हमारे साथ रहते है।
    • लेकिन हमारे पास वो चुनाव है, की हम उनकी मित्रता को माने या ना माने।
    • उस ग़लत चयन के आधार पर ही ये सारे संसार की निर्मिति हुई है। कि भगवान ने बोला की मैं आपका मित्र हूँ। तो हमने उन्हें सस्ते में ले लिया (we have taken him for granted)। मुझे नहीं चाहिए आपकी मित्रता। 
    • ऐसे हम भौतिक संसार में आ गए। 
  • गीता भगवान की दया का प्रतीक है।
    • भगवान के प्रेम का प्रतीक है।
    • गीता एक प्रकार की चाभी है। जैसे अगर कोई व्यक्ति आपसे प्रेम करता है, और चाहता है कि आप अपनी दरिद्रता से बाहर आ जाओ। तो वो आपको बहुत बडे धन तिजोरी की चाबी दे देता है। 
    • वो धन कौन सा है? 
    • भगवान के प्रेम का धन। जिसकी हमें कोई अनुभूति नहीं है। हम ख़ाली उसके बारे में सुनते है। भक्तों के प्रेम से  उसका थोड़ा थोड़ा अंदाज़ा आता है।  शुद्ध भक्तों के संग में उसकी थोड़ी सी झलक मिलती है। लेकिन अनुभूति नहीं है। 
    • लेकिन उस अनुभूति को प्राप्त करने की ये चाबी है। 
    • इसलिए भगवद गीता भगवान के प्रेम का प्रतीक है। 
    • इसलिए गीता को बार बार बार बार पढ़ना चाहिए।
    • प्रभुपाद ने सवेरे श्रीमद् भगवतम और शाम में भगवद गीता पर चर्चा का प्रोग्राम बनाया था।
    • ये उस समय full time devotees का schedule था।
    • लेकिन अभी ISKCON एक विस्तृत रूप ले चुका है। जिसमें मंदिर में ISKCON कम है, मंदिर के बाहर ज़्यादा है।  
    • इसलिए हम गृहस्थ लोगों को इस प्रकार कि चर्चा चालू रखनी चाहिए। इस चर्चा से हमारे ह्रदय को बहुत प्रेरणा मिलती है आगे जाने के लिए।
  • भगवान बता रहे है, कि भक्तो सी में सखा चेती। भक्त कौन है?
    • कभी कभी हम दूसरे लोगों के बारे में ऐसा सोचते है की ये भक्त नहीं है, भक्ति का नाटक करता है।
    • भगवान के भक्त की व्याख्या बहुत विस्तृत है।
      • एक स्तर है। भक्त मतलब शुद्ध भक्त। 
      • लेकिन उस शुद्ध भक्त के नीचे बहुत सारी श्रेणियाँ है। उन सारी श्रेणियों को भी भक्त ही बताया गया है।
      • गीता में बताया है, की 4 प्रकार के लोग मेरी भक्ति करते है। 
      • चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन ।
      • आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ BG 7/16 ॥
      • आर्तो 
      • अर्थार्थी 
      • ज्ञानी 
      • जिज्ञासु
      • भजते है, मतलब वो भक्त है। 
      • बहुत दुःख होने पर अगर कोई भक्ति में आता है। भगवान उसको भी भक्त मानते है।
    • हम कभी कभी सोचते है,  कि  ये व्यक्ति पहले तो क्या क्या करता था, अभी भक्त बनने का नाटक कर रहा है। भगवान उसको भी भक्त मानते है।
    • परम पूज्य राधा गोविंद महाराज बताते है। कि कभी कभी हम भक्त सोचते है कि भक्त वो है जो।
      • 16 माला करता है।
      • 4 नियमो का पालन करता है।
      • मंदिर जाता है।
      • Donation देता है।
      • पुस्तक वितरण करता है।
      • मंगल आरती जाता है।
      • वो भक्त है।
      • वो बताते है कि ऐसा नहीं है। आदर्श भक्त को ऐसा ही होना चाहिए। 
      • लेकिन कोई अगर इनमे से कोई भी काम नहीं करता है। लेकिन वो बोलता है कि मै भक्त हूँ। बस मैं भक्त हूँ। वो भी भक्त ही है। क्योंकि वो ये मानता है की कृष्ण मेरे आराध्य है।
  • चैतन्य महाप्रभु से प्रश्न कि हम ग्रहस्थ लोग भक्ति में प्रगति कैसे करे?
    • भगवान का नाम लो, और वैष्णवों (भक्तो) की सेवा करो।
    • हम वैष्णवों को कैसे पहचाने?
  • महाप्रभु भक्तो की 3 श्रेणियाँ करते है।
    •  जो व्यक्ति एक बार भी भगवान का नाम लेता है, वो भक्त है।
    • जो दृढ़ निस्था से भगवान का नाम ले रहा है, भगवान की वाणी में स्थिर है। जिसकी निष्ठा को कोई हटा नहीं सकथा है, वो दूसरे दर्जे का भक्त है।
    • वैष्णव वो है, जिसके आस पास होने से ही लोगों के अंदर भगवान का नाम लेने की इच्छा जाग्रत हो जाती है। जिसके केवल दर्शन से हमें भगवान का नाम लेने की इच्छा हो जाती है।
  • भगवान के भक्तो की बहुत सारी श्रेणियाँ है। और कभी भी हमें ये नहीं सोचना चाहिए की हम ही भक्त है। 32:00
    • और ऐसे कभी नहीं सोचना चाहिए कि ये सब लोग ख़ाली दिखा रहे है कि वो भक्त है। 
    • हर के भक्त बहुत sincere होता है।
    • तो हमें  भक्तो की sincerity को बहुत सम्मान देना चाहिए।
    • कोई भी व्यक्ति भगवान का नाम ले रहा है, तो वो भक्त है। और हमें उसको भक्त की तरह ही सम्मान देना चाहिए।
  • आगे भगवान भक्त की परिभाषा और strong कर देते है।
    • BG 8/14
    • अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: ।
      तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ॥ BG 8/14 ॥
    • https://vedabase.io/en/library/bg/8/14/
      • अनन्य - दूसरी कोई चेतना ना होना। केवल भगवान की चेतना होना। कोई और इच्छा ना होना।
      • सततम - निरंतर। 
      • नित्यश: - Regularly
    • Regularly has different meanings
      • दिनभर 
      • प्रतिदिन 
      • Fixed numebr of rounds
    • ऐसा भक्त बहुत आसानी से मुझे प्राप्त करता है।
    • यहाँ भगवान ने हमें एक चाभी दी है।  
  • हमारे जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य क्या होना चाहिए?
    • भगवान का भक्त बनना। भागवत प्रेम को प्राप्त करना।
    • चैतन्य महाप्रभु यहाँ तक कहते है। की भगवान के धाम जाना भी हमारा लक्ष्य नहीं है। वो अपने आप हो जाएगा। भगवान का भक्त बनना, ये हमारा लक्ष्य है।
    • मम जन्मनी जन्मनिश्वरे 
    • भक्ति मुझे प्राप्त होनी चाहिए, मुझे बहुत सारे जन्म लेने पड़ेंगे, तो भी चलेंगे।
  • भक्ति ऐसे चीज़ है, जिससे हमें भगवान की मित्रता प्राप्त हो जाती है। भगवान तो पहले से हमारे मित्र है। लेकिन हमें भी उनकी मित्रता प्राप्त हो जाती है।
  • तब जाकर ये ज्ञान भगवान हमारे हृदय में दे देंगे, जैसे अर्जुन को दिया। अर्जुन की योग्यता क्या थी?
    • वो भगवान के भक्त है। और उनकी मैत्री का पूरा अहसास उनको है।
    • हमें वो अहसास नहीं है।
    • हम लोग भगवान के होते हुए भी इस संसार में यहाँ वहाँ अलग अलग जगहों में मैत्री या सुख या प्रेम को ढूँढते है। 
    • अगर भगवान को प्राप्त करना हमारा लक्ष्य है। तो इसका मतलब ऐसा नहीं है की बाक़ी सब चीजों को छोड़ दिया।
    • उस बड़े लक्ष्य और इच्छा (कृष्ण का भक्त और मित्र बनना) के अंदर बाहर सारे छोटे मोटे लक्ष्य आएँगे।
      • job 
      • घर 
      • married life 
      • कृष्ण का भक्त यानी, वैष्णवों का भक्त 
      • कृष्ण का भक्त यानी, गीता का भक्त 
      • कृष्ण का भक्त यानी, भागवत का भक्त 
      • कृष्ण का भक्त यानी, गंगा जी का भक्त 
      • कृष्ण का भक्त यानी, गाय का भक्त 
      • कृष्ण का भक्त यानी, प्रसादम  का भक्त
      • This is the broadness of Krsna consciousness.
      • Prabhupad say We eat in Krishna. we live in Krishna.
  • अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश: ।
    तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ॥ BG 8/14 ॥
    • https://vedabase.io/en/library/bg/8/14/
    • अगर हम ये दो चीजें कर पायेंगे, तो भगवान हमें सुलब रीति से प्राप्त हो जाएँगे।
    • सततम और नित्य।
    • ऐसे भक्त हमें बनना है।

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