Bhagvad Gita 3.27
- भौतिक वादी व्यक्ति यह नहीं जानता की वह कृष्णा के अधीन है।
- हम लोगों को भी ध्यान नहीं रहता की हम कृष्ण के अधीन है।
- इसी को विमूढात्मा कहते है। हम सभी लोग विमूढ़ है।
- क्योंकि हमारी परवरत्ति क्या है, की मैं कर रहा हूँ। भक्ति भी मैं ही कर रहा हूँ।
- हम केवल इच्छा कर सकते है। हमें भगवान ने इतनी ही स्वतंत्रता दी है की हम लोग इच्छा कर करते है। और इच्छा के अनुसार कार्य करने की और दृढ़ इच्छा कर सकते है।
- इसके आगे पूरा प्रकृति ही चलाती है। ये बात को हम समझते नहीं है। इसलिए हमारे लिए विमूढात्मा का विशेषण दिया गया है। हम सब लोगों को विमूढात्मा कहा गया है।
- मूढ़ यानी मूर्ख। मूर्ख यानी जिसको कुछ समझता नहीं है। जो सही है उसको ग़लत समझता है। ग़लत को सही समझता है। मूढ़ यानी इस प्रकार का मूर्ख। विमूढात्मा माने विशेष मूर्ख। मतलब मूर्खों में भी विशेष।
- दुर्योधन कहता था की मैं सब कुछ कर रहा हूँ। I am the king
- हमारा विशेषण क्या है।
- विशेष मूर्ख।
- हमें ऐसे नहीं सोचना चाहिए की देखो कर्मी लोग कैसे विमूढात्मा होते है। हम लोग ही विमूढात्मा है। ये हमारे लिए ही है। क्योंकि हम भी तो ऐसे ही करते है।
- हम लोग इससे बाहर कैसे निकले।
- भगवद गीता ३-३० में इसका उत्तर मिलेगा।
- भक्त और अभक्त के कार्य एक जैसे दिख सकते है। पर उन्मे आकाश पाताल का अंतर होता है।
- बहुत महत्वपूर्ण है ये point
- भक्त ने भले ही अभी पूर्णत्व को प्राप्त नहीं किया होगा। वो faltering भी होगा। लेकिन उसका मोटिवेशन एकदम clear है।
- इसका उपयोग कैसे करेंगे की भक्तों को कभी criticise नहीं करना चाहिए।
- क्योंकि आपको उसका motivation पता नहीं है।
- दिखने में क्या दिख रहा है, की वो भी ऐसे ही कर रहा है जो साधारण व्यक्ति करता है। ऐसा लग रहा है की ये भी पैसों के पीछे भाग रहा है। ऐसा लगता है की ये भी इंद्रिय तृप्ति के पीछे भाग रहा है।
- लेकिन उसके पीछे जो उसका मोटिवेशन है। उसके प्रति हमें पूर्ण विश्वास होना चाहिए। सब भक्तों के प्रति।
- क्योंकि इसी विश्वास के आधार से अपनी खुद की भी भक्ति बढ़ेगी, और जो व्यक्ति जिसमें वो चिंगारी है भक्ति करने की, उसको भी अच्छा लगेगा और उसकी भी भक्ति बढ़ेगी।
- प्रभपाद जब अमेरिका गए।
- उन्होंने hippie लोगों को ऐसे ही देखा। जभी उनका बार बार पतन भी होता था।
- भक्ति सिद्धांत सरस्वती इस अंतर के बारे में बताते है।
- जब एक भक्त अपने घर में घुसता है। और जब एक कर्मी अपने घर में घुसता है। तो इन दोनो में समुद्र के जितना बड़ा अंतर होता है।
- भक्त असल में मंदिर में प्रवेश कर रहा है।
- जबकि कर्मी को ऐसे बोलते है की वो भयानक नरक में जा रहा है। इतना बड़ा अंतर है।
- जबकि दोनो एक जैसे ही कार्य करते हुए दीखते है।
- इंद्रियो से क्या करना चाहिए।
- इंद्रियो के स्वामी भगवान है, इसलिए इंद्रियो का उपयोग इंद्रियो के स्वामी की सेवा में करना चाहिए।
- ऐसा जब हम करेंगे, तो अपने आप ही जो हमें विमूढात्मा पद दिया गया है। उसको निकाल के हमें विशुद्धात्मा पद मिल सकता है।
- इसका तरीक़ा क्या है।
- इंद्रियो को भगवान की सेवा में लगाना।
- भगवान और आचार्य इंद्रियो की तृप्ति के ख़िलाफ़ नहीं है।
- जब तक इंद्रिय है, इंद्रिय तृप्ति होती रहेगी। केवल वो भक्ति के माध्यम से होनी चाहिए।
- जैसे, हमें प्रसाद तो खाना ही है। जिव्हा को कुछ रस तो चाहिए।
- लेकिन उसको हम भगवान को अर्पित करके पाते है।
- हमें कुछ अच्छा देखना है।
- भगवान के सुंदर विग्रह को देखेंगे।
- भगवान की बनायी हुई सुंदर प्रकृति को देखेंगे।
- हर चीज़ को जब हम भगवान से जोड़ कर देखते है। तो उसकी चेतना अहंकार से दूर चली जाती है।
- लेकिन इंद्रिय तृप्ति, अगर ख़ाली इसी विषय के ऊपर व्यक्ति आसक्त हो जाता है। तो वो अहंकार से लिप्त हो जाता है। और इंद्रिय तृप्ति भगवान के सेवा से करता है तो वो अहंकार से मुक्त हो जाता है।
- सारे इंद्रियो का नायक मन है। उस मन को भी भगवान की सेवा में लगाना चाहिए।
- मंत्र के द्वारा। उससे मन तीन गुणो से मुक्त होता है।
- हमारे पूरे जीवन का प्रयास है ये
- की हमारी सारी इंद्रिय और मन को भगवान की बुद्धि से चलना है। अहंकार की बुद्धि से नहीं।
- इसी को हम भक्ति का मार्ग कहते है।
- प्रभुपाद जलदूत में क्या प्रार्थना करते है।
- आप जैसे बोलेंगे, वैसे ही मैं करूँगा। मज़े कठपुतली की तरह नचाइए।
- ये भक्ति का मार्ग है। भगवान जैसे बोलेंगे, वैसे हम कार्य करेंगे।
- तव इच्छा मत
- जो भी कार्य हम करेंगे, वो भगवान की इच्छा से करेंगे।
- जितना हम ऐसे करेंगे, उतना हम विशुद्धात्मा की तरफ़ जाएँगे।
- जब हम मन, इंद्रिय और अहंकार के अनुसार चलेंगे, तो हम विमूढात्मा की तरफ़ जाएँगे।
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