Bhagvad Gita 3.14
प्रभुपाद तात्पर्य
चर्चा
- भगवान को अर्पित किये प्रसाद को लेने हमारे पाप नस्ट होते है.
- प्रसाद लेने से शरीर का आध्यात्मिक पोषण होता है पाप नष्ट होते है शरीर प्रकृति के समस्त कल्मषों से हो जाता है
- कृष्णा भावना भवित व्यक्ति, जो केवल कृष्ण को अर्पित किया गया भोजन करता है वो समस्त भौतिक दूषणो का सामना करने में समर्थ हो जाता है जो आत्म साक्षात्कार के मार्ग में बाधा बनते है। नहीं तो हम केवल अपना पाप कर्म बढ़ाएँगे । तो पाप कर्म बढ़ता जाता है। और उस पाप कर्म को भोगने के लिए अगला जन्म कूकर शूकर का मिलता है।
- यह भौतिक जगत नाना कल्मषों से पूर्ण है। और जो भी भगवान का प्रसाद ग्रहण करके उनसे निरापद हो जाता है। वह उस आक्रमण से बच जाता है। किंतु जो ऐसा नहीं करता। वह कल्मष का लक्ष्य बनता है।
- जो यज्ञ सम्पन्न नहीं करता, उसे अभाव का सामना करना पड़ेगा। यही प्रकृति का नियम है। इसलिए भोजन के अभाव से बचने के लिए यज्ञ (संकीर्तन यज्ञ) करना चाहिए।
- प्रसाद खाने से हमारा immunization हो जाता है
- हमें हमेश केवल प्रसाद ही लेना चाहिए।
- रेस्टौरेंट में खाना। अभक्तो के द्वारा बनाया गये भोजन से हर क़ीमत पर बचना चाहिए।
- समाज में ऐसा कल्चर बन गया है की हफ़्ते में एक बार तो बाहर खाना ही चाहिए।
- पहले इसको अच्छा नहीं मानते थे। और ये कृत्रिम है।
- अन्य कृत्रिम culture के उदाहरण
- कृष्ण बताते है की यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ
- श्रद्धा के उदाहरण (३१)
- प्रभुपाद के संकीर्तन से घनघोर वर्षा हुई, लेकिन नास्तिक व्यक्ति उसको नहीं समझ सकते। आध्यात्मिक सत्य को स्वीकार करने के लिए श्रद्धावान मन चाहिए। श्रद्धा के बिना हम नहीं समझ सकते।
- गणपति का दूध पीना
- सारे संसार के गणपति दूध पी रहे थे।
- हमें क्यों आश्चर्य होता है। क्योंकि हमें विश्वास नहीं है की वो पीता है।
- इसमें अविश्वास क्यों है। एक दिन गणपति ने दिखाया है की वो पीते है। लेकिन वो रोज़ पीते है।
- और रोज़ नैवेद्य खाते है।
- पुनर्जन्म (नील मोदी) का उदाहरण
- हम लोग ऐसे व्यक्ति से मिलने पर अचंभित और excited हो जाते है। जिसको अपना पूर्व जन्म याद है।
- महाराज के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। क्योंकि उनके लिए वो वास्तविक है। उनका इसमें पूरा विश्वास है।
- जैसा हमारा माहौल है, वैसी ही हमारी श्रद्धा बनती है।
- भक्तों के संग में हमारी श्रद्धा दृढ़ हो जाती है।
- ऐसे ही हमारी श्रद्धा बन्नी चाहिए। कि यज्ञ से ही वर्षा होती है।
- भोक्ताराम यज्ञ तपसम, सर्व लोक महेश्वरम।
- जो इस श्लोक का मतलब समझते है। कि सारे यज्ञों के भोक्ता भगवान है। उसको संसार में कोई हिला नहीं सकता।
- यज्ञ कर्म समुद्भव
- हम सबकी वर्ण और आश्रम के हिसाब से prescribed duty है।
- अगर हम अपनी prescribed duty properly करेंगे। कृष्ण की प्रसन्नता के लिए। वो भी यज्ञ ही है। उससे हमारे जीवन में कृष्ण आते है।
- कृष्ण बता रहे है। कि निहित धर्म(prescribed duty) के पालन से यज्ञ होता है।
- कई बार हम शास्त्र अध्ययन और चर्चा को हरिनाम से ज़्यादा महत्व देते है
- प्रभुपाद कई बार थोड़ा सा कीर्तन करते थे। और बहुत सारा कीर्तन करते थे।
- चैलेंजिंग और hostile परिस्तिथियों में और भी ज़्यादा।
- चर्चा से भगवान कम मिलेंगे। हरिनाम से ज़्यादा। चर्चा से आपका मन और बुद्धि थोड़ी शुद्ध हो जाएगी क्योंकि भगवान की चर्चा है।
- लेकिन जो साक्षात्कार है। वो हरिनाम से ही होगा।
- specially साथ में आकर हरिनाम करने से। संकीर्तन करने से।
- संकीर्तन करना बहुत आवश्यक है।
- अद्वैत आचार्य हर शाम संकीर्तन करते थे। प्रतिदिन नियम से।
- प्रभुपाद तात्पर्य में बताते है कि प्रतिदिन शाम को संकीर्तन करना चाहिए।
- भारत में TV आने के पहले लोग हर शाम आँगन में तुलसी के सामने साथ में आकर संकीर्तन करते थे।
- या कई बार रास्ते के दोनो तरफ़ के घरों के लोग शाम में साथ में आकर संकीर्तन करते थे।
- ये हमारी संस्कृति है। उसको अपने अपने तरीक़े से फिर से जागृत करना है।
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