Bhagvad Gita - 6.17 Discussion - 26 July 2020
Bhagwad Gita . 6.17
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥ १७ ॥
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ॥ १७ ॥
yuktāhāra-vihārasya
yukta-ceṣṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya
yogo bhavati duḥkha-hā
yukta-ceṣṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya
yogo bhavati duḥkha-hā
- कृष्ण भावना भावित व्यक्ति ऐसा कोई भी कार्य नहीं करता है, जो कृष्ण से सम्बंधित ना हो। इस प्रकार उसका कार्य सदैव नियमित रहता है, और इंद्रिय तृप्ति से अदूषित।
- अव्यर्थकालत्वम
Discussion
- प्रश्न: आज के समय में consistency बहुत कठिन है।
- हमें sincerity से शुरूवात करनी चाहिए।
- और हमें अपनी sincerity के लिए आत्मविश्वास (confidence) रखना चाहिए। क्योंकि बिना sincerity के हम लोग भक्ति के मार्ग पर नहीं हो सकते थे।
- We are all sincere, we are trying sincerely to follow the path of Krishna consciousness.
- Sincerity के साथ जो हम कदम लेते है, उससे धीरे धीरे consistency और steadiness आएगी। उसी के लिए ये सारे नियम दिए है।
- BG 6.16
- हमें अधिक नहीं खाना चाहिए, और कम भी नहीं।
- हमें अधिक नहीं सोना चाहिए, और कम भी नहीं।
- प्रभुपाद का formula
- अगर मन में प्रश्न है की खाऊँ या ना खाऊँ, तो नहीं खाना चाहिए।
- और अगर मन में प्रश्न है की जाऊं या ना ज़ाऊं तो जाना चाहिए।
- हम सबका एक मत है इस पर की ये कोई आसान काम नहीं है।
- ये कोई श्लोक बोलने जितना आसान नहीं है। इस shlok 50 बार दोहराया तो भी ये जीवन में उतर जाएगा, ऐसा नहीं है।
- इसको जीवन में उतारना आसान नहीं है, लेकिन असम्भव (impossible) भी नहीं है। और सबसे आसान तो भक्ति योग के तरीक़े से ही है। बाक़ी और योगों की पद्धतियों में तो बहुत कठिनाइयाँ है। क्योंकि उसकी शुरूवात ही रहती है की आप seclusion में जाओ हठ योग के लिए।
- लेकिन भक्ति योग ऐसा है, की इसको करने में भी सुख और आनंद है। और उसका जो अंतिम गंतव्य स्थान है, उसमें सबसे विलक्षण आनंद है।
- तो इसमें कोई दो राय नहीं नहीं है, की इसमें कठिनाई है, लेकिन कठिनाई है क्योंकि अभी हमें उस प्रकार का ट्रेनिंग नहीं है।
- हमने चर्चा किया की हमारे आस पास के वातावरण का भी हम पर प्रभाव होता है। उस वातावरण को तो हम बदल नहीं सकते। जैसे संसार की चीजें तेज़ी से बदल रही है, उसको हम बदल नहीं सकते। हम अपने आप को नियंत्रण में रख सकते है। इस परिस्तिथि में भी कैसे भगवान की सेवा में लगना है, इसके लिये हमें निश्चित ही Guidance चाहिए, और अभ्यास (practice) और दृढ़ संकल्प (determination) चाहिए।
- युक्ताहर vs अत्याहर
- युक्ताहर के विपरीत शब्द है, अत्याहर।
- इसके विपरीत श्लोक
- https://vedabase.io/en/library/noi/2/
- अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः ।
जनसङ्गश्च लौल्यं च षड्भिर्भक्तिर्विनश्यति ॥ २ ॥ - भक्ति का विनाश कैसे होता है।
- ज़्यादा खाना और
- ज़रूरत से ज़्यादा पैसों के पीछे पड़ना
- ज़रूरत से ज़्यादा ज्ञान के पीछे पड़ना
- ज़रूरत से ज़्यादा कुछ भी करना।
- आहार मतलब हम जिसको ग्रहण करते है। तो हम केवल जिव्हा और मुख से ग्रहण नहीं करते है। हमारे हर इंद्रियो से हम कुछ ना कुछ ग्रहण करते है।
- तो अत्याहर क्या है।
- ग़लत आहार
- ज़रूरत से ज़्यादा आहार
- कानो से सुनना
- नाक से सुगंध लेना
- आँखो से देखना।
- हर इंद्रिय का आहार moderate (ना कम ना ज़्यादा) होना चाहिए।
- प्रयासस्च
- बहुत प्रयास करना, बहुत प्रयत्न करना, बहुत पीछे लगना
- ये मुझे चाहिए, मैं ऐसे ही करूँगा, वो वर्जित है भक्त के लिए, योगी के लिए।
- भक्त/योगी उतना ही काम करता है, जितना ज़रूरत है।
- ज़रूरत कितना है वो कौन निर्णय करेगा, कितना खाना है वो कौन निर्णय करेगा। इसलिए ये सब चीजें हमारी खुद की प्रमणिकता (sincerity) पे छोड़ी गयी है। उसमें भी guidence होगा, आप किसी को पूछ सकते है, लेकिन main ingredient is of your sincerity. की मन का ना सुनते हुए मैं कैसे अपने आप को adjust करूँ?
- जैसे प्रभुपाद यहाँ खाने के लिए simple बता रहे है, की अगर आपने दृढ़ निश्चय किया की आज से मैं केवल प्रसाद खाऊँगा, मैं होटेल में यहाँ वहाँ नहीं खाऊँगा। इसी बात से अपने आप नियंत्रण आ जाता है।
- लेकिन कभी कभी आपने किसी emergency में होटेल में खा लिया, तो that is ok, लेकिन ये आदत नहीं बननी चाहिए।
- प्रसाद के स्तर
- बीज भगवान की सेवा के लिए ही लगाया। किसी दीक्षित भक्त ने प्रेम से भगवान के लिए प्रेम से बनाया और भगवान को भोग लगाया।
- किसी दीक्षित भक्त ने प्रेम से भगवान के लिए प्रेम से बनाया और भगवान को भोग लगाया।
- निम्नतम स्तर जो emergency (मजबूरी) में ही करना चाहिए। रोज़ रोज़ zomato से ऑर्डर करना emergency नहीं है।
- Eating को और moderate करने के लिए हमें माधव तिथि दी गयी है। एकादशी, आविर्भाव दिवस (appearence days), festivals, जन्माष्टमी। तीन स्तर
- निर्जल (no water)
- सजल (only water)
- सफल (only fruit)
- सब कुछ खाएँगे
- पहले ही दिन किसी निर्जल के लिए प्रयास नहीं करना चाहिए।
- प्रभुपाद ने शुरू में भक्तो को एकादशी का अभ्यास कराने के लिए एकादशी को बहुत अच्छा प्रसाद खिलाते थे। गाजर का हलवा, और चीजों का हलवा, राजगीर की पूरी, ड्राई फ़्रूट्स हलवा।
- ये टेक्नीक्स है, आहार को moderation में लाने के लिए।
- Sleeping
- हम नींद कम ले रहे है, या ज़्यादा ले रहे है, वो निर्णय कौन करेगा, जब आप fresh होकर उठते हो, और लगता है की कुछ करना चाहिए, तो वो काफ़ी है।
- अगर हम श्रिला रूप गोस्वामी की तरह 2 घंटे सोना शुरू करेंगे, तो 3 दिन में हॉस्पिटल पहुँचेंगे।
- मनोरंजन (enjoyment/recreation)
- हम लोग किसी फ़िल्म को भगवान को अर्पण नहीं कर सकते।
- क्या देख सकते है, little krishna, रामायण
- but in moderation
- हमारे सारे त्योहार भगवान से सम्बंधित है, ऐसा नहीं रहेगा तो देवता लोग अप्रसन्न होते है।
- नारद मुनि पहले जीवन में एक गंधर्व थे। वो बहुत सुंदर गाते थे, इस कारण बहुत सारी अप्सरायें उनके आस पास घूमती रहती थी। तो उनको थोड़ा मद आ गया।
- उन्होंने देवताओं की सभा में mundane गाना गया। तो तुरंत उनको शाप मिल गया, कि अरे, संगीत विद्या कृष्ण के लिए ही उपयोग करनी चाहिए। तो उन्हें तरह शाप मिल गया की जाओ आप शूद्र बन जाओ। इस प्रकार वो दासी पुत्र बने।
- Work
- जितना ज़रूरत है, पहले survival हमारी ज़रूरत है।
- लेकिन अगर survival की guarentee है (अन्न, बिस्तर, निवाला), तो ऐसी दिनचर्या होनी चाहिए, जिसमें आपका बेसिक साधना हो जाए।
- जप
- शास्त्र अध्ययन
- भक्तो का संग
- सत्संग में आना।
- समाज के लिए जो ज़िम्मेदारी है, वो भी balance रूप में करनी चाहिए।
- जब ये सब चीजें balance में होती है, तो उसको युक्त (proper work) कहेंगे।
- युक्त मतलब उसका भगवान से सम्बंध हो और उसको हम moderation में करे।
- प्रश्न: मन को कैसे समझे, की वो हमसे अलग है।
- शास्त्र के आधार पर समझना चाहिए, की मैं आत्मा हूँ, मन नहीं।
- अहम ब्रह्मास्मि है, अहम मनोस्मि नहीं है।
- कम से कम बुद्धि से हमें समझना चाहिए की हम आत्मा है, मन नहीं।
- भगवान बताते है, की ये शरीर कपड़ों के जैसा है।
- इसको समझने के लिए थोड़ा गहराई में जाना पड़ता है, हमें अपने आपको समय देना पड़ता है।
- हम अपने आप को समय नहीं देते, हम संसार के साथ ही व्यस्त रहते है।
- हम हर समय बाहर के संसार के साथ ही interaction करते रहते है। हम अपने साथ interact कब करेंगे।
- हमें अपने mind के साथ bhi interact करना चाहिए। उसके लिए रोज़ थोड़ा silence का प्रैक्टिस करना चाहिए।
- Just connect with yourself, feel every part of your body. think about your mind. think what is going on. look at it from different angles that what my mind is thinking. practice it. मौनम also helps.
- ये ऐसा है, की हम बैठ कर स्क्रीन पर देख रहे है, की मेरा मन क्या कर रहा है, किधर जा रहा है।
- पूरा दिन हम लोग भाग दौड़ करते रहते है, और हम नहीं भागेंगे तो दुनिया हमें भागती है।
- सोशल मीडिया
- लोगों के messages
- सब लोग हमको push करने का प्रयास करते है, But why should we get pushed, we should give ourself time.
- Practice neutrality (उदासीन). (BG 12.16)
- भक्त का एक गुण है, की वो उदासीन रहता है। वो अपने आस पास की परिस्तिथियो से उदासीन रहता है।
- इस कारण वो बाहर से देखता है, की उसके जीवन में क्या चल रहा है। इसलिए वो कभी डरता नहीं है किसी से।
- क्योंकि वो तटस्थ होकर देख रहा है तो उसको समाधान (solution) भी मिलता है, की मैं इससे कैसे निपट सकता हूँ (how can i deal with it)
- but when you are part of it, then you cannot think about it.
- जब हम उस समस्या को बाहर से देखेंगे, तो हम उस समस्या को और उस समस्या का समाधान कैसे कर सकते है, उसको समझ सकते है। उदासीनता के अभ्यास से ऐसा होता है।
- स्वच्छता (अंदर और बाहर से)
- मन को बराबर से देखने के लिए हमें स्वच्छता चाहिए, अंदर और बाहर से
- घर बिलकुल साफ़ होना चाहिए (House should be extremely clean)
- हमें कम से कम दो बार स्नान (bath) करना चाहिए। तीन बार अच्छा है। पेट साफ़ करने के बाद ज़रूर स्नान करना चाहिए।
- क्लीन शेव, साफ़ कपड़े। इस स्वच्छता से हमारे जीवन में सतोगुण आता है। और इस सतोगुण में हम मन को आसानी से महसूस कर सकते है।
- अंदर की सफ़ाई के लिए।
- शुद्ध विचार, शास्त्र के आधार पर विचार।
- गीता recitation, गीता अध्ययन, कृष्ण कथा सुनना
- नाम संकीर्तन करना।
- जैसे चैतन्य महाप्रभु के द्वारा गुण्डिचा मंदिर की सफ़ाई। मंदिर की सफ़ाई और हरिनाम संकीर्तन।
- ये मन को स्नान करने जैसा है। मन गंदा है, उसको अच्छे से स्नान कराना।
- अच्छे से जप करके।
- अच्छे से कृष्ण कथा करके।
- फिर मन एकदम ठंडा हो जाता है। एकदम दृढ़ (steadfast) हो जाता है। कुछ भी उसको डिस्टर्ब नहीं कर सकता है।
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