BG 8-06
Bhagwad Gita . 8.6
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ॥ ६ ॥
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित: ॥ ६ ॥
yaṁ yaṁ vāpi smaran bhāvaṁ
tyajaty ante kalevaram
taṁ tam evaiti kaunteya
sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
tyajaty ante kalevaram
taṁ tam evaiti kaunteya
sadā tad-bhāva-bhāvitaḥ
- इस श्लोक में भगवान हमको चेतावनी भी दे रहे है, और बहुत सुंदर भविष्य भी दिखा रहे है।
- सुंदर भविष्य
- जिसने exam के लिए तैयारी किया है, अच्छी preparation किया है, पूरे जीवन भर अभ्यास किया है, इस पाठशाला (स्कूल) को गम्भीरता लिया है, उनको यश मिलेगा भगवान के स्मरण से ।
- अगर जीवन भर हमने अभ्यास किया है भगवान का स्मरण करने का, तो अंत में अपने आप ही भगवान का स्मरण होगा, निश्चित रूप से।
- ये श्लोक बहुत आशादायी है।
- चेतावनी
- अगर हम मृत्यु के समय कुछ दूसरा सोचेंगे, तो वहाँ चले जाएँगे।
- जैसे भरत महाराज
- So Be serious and take your preparation very seriously. (इसलिए हमें अपनी भक्ति को बहुत गम्भीरता से लेना चाहिए)
- हमें ये श्लोक चोकन्ना रहने के लिए बताया है, ताकि हम causal ना रहे।
- चेतावनी क्या है, की गड़बड़ मत करो, अपराध मत करो, अंदर भौतिक इच्छायें मत रखो। सारी इच्छाओं को शुद्ध करके भगवान की जो इच्छा है, उसको साथ जुड़ जाओ।
- जैसे
- खटवांग महाराज
- श्रिला प्रभुपाद
- रशियन (russion) भक्त का शरीर छोड़ते समय साक्षात्कार
- Srila Prabhupad has not cheated us, this process works.
- अगर हम प्रमणिकता से भक्ति का अभ्यास करते है, तो हमें जिन चीजों को रोज़ याद करने की आदत है, वो हमें मृत्यु के समय भी याद आएँगी।
- ये भगवान का आश्वासन है।
- प्रश्न: इच्छाओं को शुद्ध कैसे करे?
- हमें अनुशाशन (discipline) से भक्ति करनी चाहिए।
- गुरु के आदेश से जप करना चाहिए।
- गुरु के आदेश से भागवत गीता का पठन करते है।
- गुरु के आदेश से भक्तो के साथ अच्छा नम्र व्यवहार करते है, अपराध नहीं करते।
- ये सब करने से, और भगवान का कार्य करने से, या जो भगवान का कार्य कर रहे है, उनको सहयोग करने से, हमारी इच्छायें शुद्ध हो जाती है।
- सुबह से शाम तक जीवन जीने का सिम्पल तरीक़ा।
- अनुकूलस्या संकल्पम, प्रतिकूलस्या विवर्जनम।
- जो जो मेरी भक्ति के लिए अनुकूल है, उसको मैं स्वीकार करूँगा, और जो प्रतिकूल है, उसको त्यागूँगा।
- कभी कभी प्रतिकूल चीज़ हमें बहुत लुभावनी लग सकती है, फिर भी उसको हम दृढ़ निश्चय से त्यागेंगे।
- अनुकूल चीज़ कभी कभी हमको तकलीफ़ दे सकती है, लेकिन फिर भी हम उसको स्वीकार करेंगे।
- जैसे.. सुबह जल्दी उठना
- दो बार स्नान करना
- भगवान के लिए रसोई करना
- हमारा घर साफ़ सुथरा रखना
- हमारा मन भी एक मंदिर है, तो हमारे मन में जब काम, क्रोध, लोभ आदि के ग़लत विचार आते है, तो उन सबकी सफ़ाई होनी चाहिए - क्योंकि वो सफ़ाई भक्ति के अनुकूल है।
- मन को स्वच्छ करने करने के लिए जप में तकलीफ़ हो, तो भी हमें उसको गंभीरता से करना चाहिए।
Thank you Prabhuji for sharing your notes...
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